याद
अकसर चलते-चलते
मैं खो जाता हूँ
कुछ पुराने निशानों में
जो बसे हैं अपनी यादों में
खुदा जाने यादें हैं सच्ची
या देखी थीं केवल ख़्वाबों में
कभी लगता है गुज़रा हूँ
इस ख़ामोश जंगल से
कभी लगता है आया हूँ
इन कब्रगाहों में
कभी लगता है हर अजनबी
जाना-पहचाना-सा
ये यादें हैं गुज़री
ज़िंदगानी की
या फिर ये वो ख़्वाब हैं ठहरे
जो ग़फ़लत दिखलाते थे रातों में
ना जाने कौन अक्सर
रातों को बुलाता है
इस दुनिया से दूर
कहकशाओं में
एक दुनिया नई-सी है
जहाँ बना है एक स्वप्न-महल
जहाँ से ये सदा आती है
जो मुझे बुलाती है
वहाँ कौन रहता है
जो हमको बुलाता है
वह कौन है!
और क्या उससे नाता है
शायद उससे प्यार हुआ था!
क्षितिज के उस पार
मिलने का इक़रार हुआ था
उसे पा जाने को
क्षितिज की तरफ़ चलता हूँ
फिर भी उतनी दूर खड़ा हूँ
जितना आगे बढ़ता हूँ
दूर क्षितिज पर शायद तू है
या क्षितिज है स्मृतियाँ तेरी
सूरज उदय हो या अस्त,
उसमें दिखती हैं विस्मृतियाँ तेरी
क्षितिज के इस पार खड़ा मैं
देख रहा हूँ नित नेम से
प्रिय, तुमको बड़े प्रेम से
हाँ, क्षितिज के इस पार खड़ा मैं
प्रतीक्षारत प्रेम लिए
आओ प्रियतम, छोड़ दो क्षितिज को
आ जाओ तुम इस पार
वरना ये बतला दो मुझको
कहाँ मिलेगा मेरा प्यार...
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