किसी आदमी की ज़िंदगी में मोहब्बत कब दाख़िल होती है, इसका ठीक-ठीक पता शायद उसे भी नहीं चलता। बाद में जब वह पीछे मुड़कर देखता है तो उसे लगता है कि हाँ, यही वह मोड़ था, यहीं से रास्ता बदल गया था। मगर उस समय रास्ता बदलने की कोई आवाज़ नहीं होती। आदमी उसी तरह चलता रहता है, जैसे कल चलता था, और एक दिन पाता है कि जिस रास्ते को वह अपना समझ रहा था, वह कहीं और ले आया है।
आरमान और नायरा की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी।
वे एक-दूसरे के लिए बिल्कुल अपरिचित नहीं थे। रिश्तों की एक ऐसी परिधि में आते थे जहाँ परिचय के लिए किसी परिचय की ज़रूरत नहीं होती। एक-दूसरे को जानते थे, देखते थे, मगर जानना और पहचानना दो अलग बातें हैं। कई बार आदमी सामने वाले को वर्षों तक देखता रहता है और उसके भीतर छिपे हुए आदमी से उसका परिचय तब होता है जब किसी संयोग से दो शब्द अधिक बोलने पड़ जाएँ।
उनके बीच भी पहले दो-चार शब्द ही थे।
फिर बातचीत हुई।
फिर रोज़ होने लगी।
और फिर उस रोज़मर्रा की बातचीत में कुछ ऐसा घुल गया जिसका नाम उस समय दोनों में से किसी ने नहीं रखा था।
नायरा अपने दुखों की बातें करती। आरमान सुनता। वह कोई बड़ा आदमी नहीं था जो हर समस्या का समाधान जानता हो। मगर सुन लेने का हुनर उसमें था। शायद इसी कारण नायरा उससे बातें करती रही।
आरमान ने उसके दर्द पर एक नज़्म लिखी।
उसे यह मालूम नहीं था कि वह नज़्म किसी और के दुख पर लिखी गई थी या अपने आने वाले दुख की भूमिका थी।
एक दिन नायरा ने पूछा—
“क्या तुम मुझसे प्यार करते हो?”
आरमान ने हाँ कह दिया।
नायरा ने कहा—
“मैं तो मज़ाक कर रही थी।”
बात वहीं खत्म हो जानी चाहिए थी।
मगर कुछ बातें कही जाने के बाद वापस नहीं जातीं।
आरमान के लिए वह प्रश्न मज़ाक नहीं रहा था। उसने उस एक “हाँ” के भीतर जाने कितने भविष्य देख लिए थे।
फिर वही खट्टी-मीठी बातचीतें शुरू हुईं। रूठना, मनाना, देर रात तक जागना, छोटी बातों पर नाराज़ होना और फिर उसी नाराज़गी को भूल जाना।
मनुष्य प्रेम में कितना सरल हो जाता है।
वही आदमी जो संसार के सामने अपने विवेक का दावा करता है, एक व्यक्ति के सामने आकर इतना असहाय हो जाता है कि उसकी एक मुस्कान को तर्क और एक ख़ामोशी को फैसला समझने लगता है।
फिर एक दिन नायरा ने किसी और से शादी की बात कही।
आरमान के भीतर जैसे किसी ने अचानक दरवाज़ा बंद कर दिया।
उसने बात को समझने की कोशिश की, मगर प्रेम में समझने से पहले आदमी डरता है। उसे हर सम्भावना में वही दिखाई देता है जिससे वह सबसे ज्यादा डरता है।
बात बढ़ी।
एक कॉन्फ्रेंस कॉल हुई।
आरमान रोया।
बहुत रोया।
और उसी रात नायरा ने उसे फोन किया। उसे समझाया। उसके पास बैठी रही, उसे खाना खिलाया और कहा—
“आरमान, मैं हैरान हूँ कि आज के दौर में भी कोई इस तरह मोहब्बत कर सकता है।”
उस वाक्य ने आरमान को फिर से जीवन दे दिया।
उसे लगा था कि आदमी को प्रेमिका नहीं, केवल एक वाक्य बचा सकता है।
और फिर वे फिर साथ चलने लगे।
कुछ समय तक सब ठीक रहा।
फिर उससे भी ज्यादा ठीक।
उनकी मोहब्बत में अब वह बेफ़िक्री आ गई थी जो केवल उन लोगों में होती है जिन्हें लगता है कि वे एक-दूसरे को पा चुके हैं।
वे लड़ते थे, मगर लड़ाई में भी एक-दूसरे की जगह जानते थे।
एक रूठता तो दूसरा मनाता।
एक रोता तो दूसरा चुप कराता।
फिर एक दिन वह सीमा भी टूट गई जिसे दोनों ने कभी शब्दों में तय नहीं किया था। वे जिस्मानी तौर पर भी करीब आ गए।
उसके बाद प्रेम पहले जैसा नहीं रहा।
वह अधिक गहरा था, मगर अधिक नाज़ुक भी।
क्योंकि अब खोने के लिए बहुत कुछ था।
और जहाँ बहुत कुछ खोने को हो, वहाँ आदमी हर आहट को ख़तरा समझता है।
परिवार बीच में आने लगे।
लोगों की बातें आने लगीं।
किसी ने कुछ कहा, किसी ने कुछ समझा, किसी ने किसी से कुछ सुना।
सच क्या था और वह सच किसके पास था—यह धीरे-धीरे महत्वहीन हो गया।
महत्वपूर्ण केवल इतना रह गया कि दोनों के बीच विश्वास कमजोर पड़ने लगा।
आरमान ने पहली बार एक लंबा ख़त लिखा।
वह ख़त प्रेमिका को कम और अपने टूटते हुए विश्वास को अधिक लिखा गया था।
उसने लिखा—
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[पहला ख़त]
«तुम्हारे ड्रामे तुम्हें ही मुबारक।
हम नॉवेल लिखेंगे—ऐसे नॉवेल, जो मेरे बाद भी तुम्हें तुम्हारी याद दिलाते रहेंगे।
तुम्हारी हरकत अच्छी नहीं थी। मगर चाहकर भी तुमसे नफ़रत नहीं कर सकता। आख़िर तुमसे मोहब्बत की है। और जो मोहब्बत मैंने तुमसे की है, वह अब नफ़रत में नहीं बदल सकती—मरते दम तक नहीं।
तुम चाहो तो ऐसे अनगिनत ड्रामे कर सकती हो। मुझे तुमसे कोई गिला नहीं है। न नफ़रत है, न कभी होगी।
हाँ, ख़ुद पर ज़रूर अफ़सोस रहेगा कि............
ख़ैर, मैं ड्रामे नहीं करता।
मैं कल से ही बीमार हूँ, मगर तुम्हारे प्रति अपनी आसक्ति ने बुख़ार में भी तुम्हें मैसेज करने पर मजबूर कर दिया।
न मैंने तुम्हें छोड़ा है, न तुम्हारे साथ कोई बेवफ़ाई की है। मेरे लिए पहला प्यार भी तुम थी, आख़िरी प्यार भी तुम हो—और रहोगी।
तुम मुझे मिलो—जिसकी उम्मीद अब न के बराबर है—या न मिलो, मैंने तुम्हें हमेशा के लिए अपने भीतर संजोकर रखने का फैसला कर लिया है।
मैंने अपनी कहानी के ऊपर एक और कहानी लिखने का फैसला किया है।
उसमें कोशिश करूँगा कि हर उस बात का जवाब दूँ, जो कभी तुम्हारे इल्ज़ाम बने—ख़ाला की दी हुई बातों से लेकर मामू की बातों तक, तुम्हारी कामुकता से लेकर मेरी ख़ामोशी और मेरे डरपोकपन तक।
सब कुछ होगा।
और शायद उसके बाद ही मेरी ज़िंदगी का फैसला होगा।
मैं अपने अल्लाह की कसम खाकर कहता हूँ कि मैंने न तो फ़ैज़ान से कभी कुछ कहा, न हमज़ा और नायरा से, न किसी और से।
न मैंने कभी किसी से कहा कि मेरा तुम्हारे साथ कोई मैटर है।
मैं अल्लाह की कसम खाकर यह भी कहता हूँ कि मैंने न कभी किसी का बुरा चाहा, न सोचा।
और अल्लाह की कसम खाकर यह भी कहता हूँ कि मुझे जितना तुमसे प्यार है, उतना ही तुमसे डर भी है। शायद इसी वजह से मैं अक्सर तुमसे बात करने में भी ख़ौफ़ खाता रहा।
मैं अल्लाह की कसम खाकर कहता हूँ कि मैंने तुम्हें लेकर कभी कोई ग़लत सोच या इरादा नहीं रखा।
अब अगर मैं कोई कदम उठाता हूँ या आगे कुछ करता हूँ, तो उसकी तुम्हारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं होगी। न ही अब तुम पर मेरा कोई हक़ है, न तुम पर मेरी कोई ज़िम्मेदारी है।
मैं अपनी बात और अपने हर काम के लिए ख़ुद ज़िम्मेदार हूँ।
बस इतना ही कहना था।
ख़ुदा तुम्हें हमेशा ख़ुश रखे।
अल्लाह हाफ़िज़।»
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ख़त भेज दिया गया।
मगर प्रेम की एक अजीब आदत है—वह आदमी के भेजे हुए ख़त का इंतज़ार नहीं करता, बल्कि उसके जवाब का इंतज़ार करवाता है।
और जवाब आया।
फिर बातचीत हुई।
फिर मुलाक़ातें हुईं।
फिर वही प्रेम लौट आया जिसे आरमान ने समझा था कि वह खो चुका है।
यही तो मोहब्बत की सबसे बड़ी चाल है।
वह टूटकर आदमी को यक़ीन दिलाती है कि अब कुछ नहीं बचा, फिर उसी टूटे हुए आदमी को दो मीठे शब्द देकर अपने पुराने घर में वापस बुला लेती है।
आरमान लौट आया।
इस बार पहले से अधिक डूबा हुआ।
दोनों ने फिर अपने भविष्य की बातें कीं।
कभी शादी की।
कभी घर की।
कभी नौकरी की।
कभी उस छोटे-से संसार की जहाँ दुनिया की दखल न हो।
आरमान ने शायद अपने भविष्य को नायरा के चेहरे से जोड़ दिया था।
उसे लगता था कि आदमी का भविष्य कोई तारीख नहीं, एक व्यक्ति होता है।
मगर नायरा के भीतर कुछ धीरे-धीरे बदल रहा था।
यह बदलाव किसी घोषणा के साथ नहीं आया।
वह बातचीत के बीच आया।
जवाबों की लंबाई में आया।
ख़ामोशियों में आया।
कभी वह आरमान के पास होती और फिर अचानक इतनी दूर चली जाती कि आरमान को अपनी ही मोहब्बत पर शक होने लगता।
वह पूछता—
“क्या हुआ?”
नायरा कहती—
“कुछ नहीं।”
और प्रेम में “कुछ नहीं” अक्सर सबसे बड़ा “कुछ” होता है।
आरमान फिर भी बना रहा।
उसे विश्वास था कि मोहब्बत केवल दूरी से खत्म नहीं होती।
उसने अपने मन को समझाया कि हर रिश्ते में ऐसे दौर आते हैं।
फिर एक दिन उसने दूसरा ख़त लिखा।
पहले ख़त में शिकायत थी।
दूसरे में स्मृति।
पहले में बचाने की कोशिश थी।
दूसरे में अपने पूरे रिश्ते को एक बार फिर समझ लेने की बेचैनी।
उसने लिखा—
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[दूसरा ख़त]
«प्रियतमा,
उम्मीद है तुम खैरियत से होंगी। मैं आज भी तुम्हारे बैचेन और उदास हूं। और अपने बाते लम्हात याद कर रहा हूं।
मैं यह तो नहीं कह सकता है कि मैंने तुम्हें पहली बार तुम्हें तब देखा और तुम्हारी मुहब्बत में गिरफ्तार होगया। क्योंकि मैं तो तुम्हें अपने आखिरी याद को टटोलता हूं तो वहां भी पाता हूं। आज मुझे तुमसे मुहब्बत है हद से ज्यादा है। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था और 2019 से पहले तो मैं सोच सकता भी नहीं था।
असल कहानी शुरू होती है 2018 से। जब से मैं तुमसे व्हटअप पर जुड़ा और बात शुरू हुई।
हांलांकि ये बातें सिर्फ नोर्मल थी जोकि कजन आपस में कर लेते हैं। तब भी तुम्हें में उस नजरिए से नही सोचता था। मैने इसी दौरान तुम्हारे दर्द को महसूस किया। इस पर मैंने एक नज़्म भी लिखी।
फिर एक दिन तुमने मैसेज किया कि क्या तुम मुझसे प्यार करते हो? यह वोह वक्त जब मैं तुम्हारी जानिब माइल हो चुका था।
मैने कहा 'हां' और तुमने कहा कि मैं तो मज़ाक कर रही थी। लेकिन मैं तुम्हारी मुहब्बत में गिरफ्तार हो चुका था।
ऐसे ही खट्टी-मीठी बातों के साथ वक्त बीता और फिर ग़लबन 2020 में फिर आया वक्त जिस जिन वो घटना हुई कि तुम मुझे कहती हो कि मैंने तुम्हारा प्यार छीन लिया।
एक दिन तुमने कहा कि मैं तो अदनान से शादी करूंगी। इत्तेफाक से उस शाम को अदनान आया और बाजी ने कहा मुमानी का नम्बर दियो कुछ बात करनी है। मुझे लगा कि तुमने अदनान से बात करके बाजी से कहा होगा तभी तो बाजी बात करने के नम्बर मांग रही हैं। मैने तुम्हे मैसेज करा और उसके बाद हुई लड़ा मेरे तुम्हारी और अदनान की कांफ्रेंस काल पर खत्म हुई। मैं बहुत रोया , तुमने कॉल करके बात करी तसल्ली और खाना खिलवाया और मुझे आज भी याद है तुमने कहा था कि आरमान मैं हैरान हूं कि आज के दौर में भी इस तरह मुहब्बत कर सकता है।
इसके बाद मैं तुम्हारे मुहब्बत के दरिया में डूबता चला गया। हम बात करते रहे लड़ते रहे, रोते रहे।
मैं लड़ता तो तुम रो देती और तुम लड़ ती तो मैं मना लेता था। वक्त गुजारा गया और हमारी मोहब्बत और गहरी होता गई और फिर वो हुआ जो नहीं होना था। हम जिस्मानी तौर पर भी करीब आ गए।
और तुम...... तुम्हें लगता है कि इस बात का दुख सिर्फ तुम्हें ही है। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा। ऐसा नहीं है
बताओ मैं क्या करता ? और तब भी क्या कर लिया सब कदम तुमने खुद अपनी मर्जी से उठाए, मैं जब भी आया तुम जा चुकी।
मुझे भी तुम्हारा जितना दुख है। मैं आज भी रातों को सो नहीं पाता हूं।
प्रिय मैंने तुमसे मुहब्बत कोई व्यापार के तौर पर नहीं की है। मैं तुम्हें अपने दिल और रूह की गहराई से चाहता हूं। मैं अपनी सारी जिंदगी तुम्हारे पहेलू में गुजार देना चाहता हूं। तुम्हें खुद अंदाजा है मेरी मुहब्बत का।
अगर तुम्हें मुझसे कोई शिकायत है तो बताओ। मैंने कब तुम्हारी बात को काटा है।
आखिर तुमसे मुहब्बत की है। अब ये नफरत में नहीं बदल सकती मरते दम तक
न ही नफरत है न ही होगी। हां ख़ुद पर ज़रूर अफसोस रहेगा कि............
न मैने तुम्हें छोड़ा न हि कोई बेवफाई की है। मेरे लिए पहल प्यार आख़िरी प्यार दोनो तुम थी हो और रहोगी।
तुम मुझे मिलों(इसकी उम्मीद अब न की बराबर हैं) या न मिलो, मगर मेने तुम्हें हमेशा के लिए संजो कर रखने का फैसला कर लिया है।
मैं अल्लाह की कसम खा कर यह भी कहता हूं कि मैंने न कभी किसी का बुरा चाहा और न ही सोचा
मैं अल्लाह की कसम खा कर यह भी कहता हूं मुझे जितना तुमसे प्यार है उतना ड़र भी है। इसी वजह से मैं अकसर तुमसे बात करने में खौफ भी खाता हूं।
मैं अल्लाह की कसम खा कर यह भी कहता हूं कि मैंने कभी तुम्हे लेकर कभी भी कोई गलत सोच या इरादा नही रहा।
मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं। ऐसा कोई दिन कोई नमाज़ नहीं गई जिसमें मैंने तुम्हें न मांगा हो। मगर अब मेरा हौसला पस्त हो रहा है। मेरी हिम्मत जवाब दे रही है। सारी रात वहटस अप पर तुम्हारा नम्बर खोल कर इंतजार करता रहता हूं कि तुम अनब्लॉक करके कहोगी कि पागल मैं तो मज़ाक कर रही थी तू तो मेरी नस-नस में बसा है। मगर मुद्दत हो गई इंतजार करते-करते। आंखें रोते रोते मंद पड़ गई मगर तुमने अनब्लॉक नहीं किया। पिछले दो हफ्ते में सिर्फ दो दिन सोया हूं वो भी नींद की दवाई खाने के बाद।
मैं तुम्हारे गम में घुला जा रहा और तुम हो कि तुम्हे कोई अहसास ही नहीं है।
खुदाया ऐसी बेहिस मत बनो, मुझ पर इस तरह जुल्म न करों। मान भी जाओ। नौकरी करके तुम्हारा और अपना खर्च उठा लुंगा। प्लीज़ तुम इंकार मत करना मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूं और हमेशा करता रहूंगा यहां तक कि मैं मर जाउ या कयामत आ जआए।
तुम हमेशा मेरे दिल मेरी यादों में बसी रहोगी।मैं हमेशा इतंजार करता रहूंगा।
दिल को है तेरी तमन्ना, दिल को है तुमसे ही प्यार
तू आए या न आए हम करेंगे इंतजार।
तुम्हारा मुंतजिर
तुम्हारा पागल जोगी
हाँ दिल का दामन फैला है
क्यूँ गोरी का दिल मैला है
हम कब तक पीत के धोके में
तुम कब तक दूर झरोके में
कब दीद से दिल को सेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो
क्या झगड़ा सूद ख़सारे का
ये काज नहीं बंजारे का
सब सोना रूपा ले जाए
सब दुनिया, दुनिया ले जाए
तुम एक मुझे बहुतेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो»
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इसके बाद कहानी में वह समय आया जिसे आरमान बाद में अपने जीवन का सबसे लंबा समय कहता था।
नायरा अब पहले जैसी नहीं थी।
वह पूरी तरह आरमान से अलग भी नहीं हुई थी, मगर उसके भीतर किसी और के लिए जगह बन रही थी।
पहले उस जगह का नाम नहीं था।
फिर उसका नाम साहिल हुआ।
साहिल कोई तूफ़ान बनकर नहीं आया।
वह धीरे-धीरे आया।
बातों में।
साथ में।
सुविधा में।
और फिर शायद उस भरोसे में जिसकी आरमान से नायरा को कभी-कभी शिकायत रहती थी कि वह उसे दे नहीं पाया।
आरमान को देर से पता चला।
जब पता चला तो उसने पहले यक़ीन नहीं किया।
फिर उसने अपने सामने रखे हुए सच से आँखें चुराईं।
मगर सच से आँखें चुराने का मतलब यह नहीं कि सच गायब हो जाता है।
नायरा अब किसी दूसरे आदमी की ओर बढ़ रही थी।
यह बात आरमान को इसलिए नहीं तोड़ रही थी कि कोई दूसरा उसकी जगह ले रहा था।
उसे इसलिए तोड़ रही थी कि नायरा स्वयं अपनी जगह बदल रही थी।
जिस लड़की ने कभी उससे कहा था कि वह उसकी नस-नस में बसी है, वही अब किसी और की दुनिया में अपना घर बना रही थी।
आरमान के पास पुराने वाक्य थे।
साहिल के पास नया समय।
आरमान के पास यादें थीं।
साहिल के पास भविष्य।
और भविष्य की ताक़त हमेशा अजीब होती है। वह स्मृतियों को पराजित नहीं करता, बस उनके लिए जगह कम कर देता है।
नायरा ने धीरे-धीरे स्वयं को साहिल के हवाले कर दिया।
आरमान को अब यह समझने में देर नहीं लगी कि प्रेम में कभी-कभी आदमी हारता नहीं है—बस सामने वाला उसके बिना आगे बढ़ जाता है।
वह अकेला रह गया।
उसके कमरे में अब भी वही फोन था।
वही पुरानी चैटें थीं।
वही तस्वीरें थीं।
वही डायरी थी।
लेकिन वह लड़की नहीं थी।
और शायद अब लौटने की कोई जगह भी नहीं थी।
आरमान ने बहुत दिनों तक कुछ नहीं लिखा।
फिर एक रात उसने तीसरा ख़त उठाया।
इस बार उसके पास कहने को बहुत कुछ था।
मगर पहली बार उसे मालूम था कि कह देने से कुछ बदलेगा नहीं।
उसने लिखा—
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[तीसरा ख़त]
«सच कहु तो मुझे उम्मीद नहीं थी तू ऐसा करेगी।
अब तक मैंने वफ़ादारी करी कभी किसी और के बारे में सोचा तक नहीं।
लेकिन हक़ीक़त बात यही है कि एकतरफ़ा मोहब्बत एकतरफ़ा ही रहती है। कोई तुम्हारी ज़िद से तुम्हारी तरफ़ माइल हो भी जाए तो भी वह मौका पाकर छोड़ ही देता है।
अब मुझे यक़ीन है कि इस दुनिया में मोहब्बत जैसा कुछ नहीं, बस एक भरम है।
जो नज़्में मैंने तुम्हारे से पहले लिखी थीं, सब relevant हो गई हैं।
मेरे ब्लॉग पर सब है, तुम्हारे नाम लिखे दो ख़त भी.. जो कभी publish नहीं किए हैं..
काश तुम पढ़ पाती...
मगर नहीं, कभी नहीं।
अब तुम उन्हें कभी नहीं पढ़ पाओगी।
मेरी ज़िंदगी में मेरा सरमाया सिर्फ़ मोहब्बत था, वह भी नहीं रहा..
तुम्हारे अपनों ने ख़ासकर ख़ाला और मामू ने मना किया, मैंने नहीं माना।
मेरा दिल अब भी गवारा नहीं करता कि मैं मानूँ...
लेकिन सच्चाई और सच से मैं मुँह नहीं मोड़ सकता हूँ। न तो वह तस्वीर fake है, न chat।
ख़ैर, तुमने जो भी किया, सोच-समझकर अपने भले के लिए ही किया होगा..
8 साल का अरसा बहुत होता है, आसान नहीं होता है ना, छोड़ना ना हो भूलना।
ख़ैर, ये दिन भी कट जाएंगे।»
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आरमान ने ख़त पूरा किया।
कुछ देर उसे पढ़ा।
फिर डायरी बंद कर दी।
इस बार उसने उसे भेजा नहीं।
क्योंकि कुछ ख़त ऐसे होते हैं जिन्हें डाक की ज़रूरत नहीं होती।
वे लिखे ही इसलिए जाते हैं कि आदमी अपने भीतर जमा आवाज़ को बाहर निकाल सके।
उस रात आरमान बहुत देर तक खिड़की के पास बैठा रहा।
शहर सो रहा था।
किसी दूसरे घर में शायद नायरा जाग रही थी।
शायद साहिल से बात कर रही थी।
शायद आने वाले दिनों की कोई योजना बना रही थी।
और यह विचार आरमान के लिए अजीब तरह से कड़वा था कि जिस भविष्य की कल्पना उसने आठ वर्षों तक की, वह भविष्य अब किसी और के साथ लिखा जा रहा है।
लेकिन जीवन को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि हमने उसकी कितनी अच्छी योजना बनाई थी।
वह अपनी गति से चलता रहता है।
सुबह हुई।
आरमान ने तीनों ख़त एक साथ रखे।
पहले ख़त में वह आदमी था जिसे डर था कि उसकी मोहब्बत उससे छिन रही है।
दूसरे में वह आदमी था जिसे विश्वास था कि मोहब्बत अभी बची हुई है।
तीसरे में वह आदमी था जिसने पहली बार स्वीकार किया था कि मोहब्बत बची रह सकती है, मगर रिश्ता नहीं।
उसने तीनों ख़तों को एक फ़ाइल में रख दिया।
ऊपर कोई नाम नहीं लिखा।
बस इतना लिखा—
“उसके नाम, जिसे मैंने खोकर पाया कि मैं कौन था।”
फिर उसने कलम उठाई और एक आख़िरी पंक्ति लिखी—
“वह किसी और की हो गई। मैं उसके विरह का हो गया।”
और शायद यही इस कहानी का सबसे कठिन सच था।
नायरा ने अपनी ज़िंदगी चुन ली थी।
आरमान ने अपनी यादें।
वह किसी दूसरे के घर की रोशनी बन गई।
आरमान अपनी मेज़ पर बैठकर उन अँधेरी रातों का लेखक बन गया जिनमें वह रोशनी कभी आया करती थी।
मोहब्बत का अंत हमेशा मिलन या बिछड़ना नहीं होता।
कभी-कभी उसका अंत यह होता है कि एक व्यक्ति जीवन में आगे बढ़ जाता है और दूसरा पीछे रहकर उस रास्ते की धूल में अपने पुराने पदचिह्न खोजता रहता है।
आरमान भी खोजता रहा।
फिर एक दिन उसने खोज बंद कर दी।
भूलने के लिए नहीं।
बल्कि इसलिए कि उसे समझ आ गया था—
कुछ लोगों को ज़िंदगी से विदा किया जा सकता है, यादों से नहीं।
और कुछ प्रेम कहानियाँ दो लोगों की नहीं रहतीं।।