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मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019

स्वप्न

हंसी मजाक के वातावरण में
जब गुजर जाते हैं
अनेक दिन
तो प्रतीत होने लगता है
वास्तविक ।

 हंसी मजाक में
तप कर
बाहर निकलने वाला सच
मानो सोना खरा।

हाँ  मुझे स्वीकार है
पसंद करता हूँ तुमको
और  कि तुमसे प्यार है।

 पर यह रहस्य 
अब तक रखा है
छुपा कर
अब तुम भी
राजदार हो।

 आह!
निंद्रा
तुम फिर विचलित हो गई
स्वप्न से जाग गया मैं,
मेरे स्वप्न टूटने की
तुम भी जिम्मेदार हो।

#शोएबवाणी

तुम्हारी व्यथा

तुम्हें मुस्कुराते देख
प्रफुल्लित हो उठता है मन
परन्तु यह खुशी हो जाती है काफूर
जब ध्यान से देखता हूँ
तुम्हारी तस्वीर को,
जिसमे मुस्कराहट के
पीछे छिपी पीड़ा
बना देती है प्रश्न चिन्ह
तुम्हारे माथे पर ।

तुम्हारे व्हटसअप स्टेटस
के आलोक में,
तुम्हारे चेहरे की मुस्कान
और उसके पीछे छिपे दर्द
की कल्पना करते हुए
खो जाता हुं
तार्किक गणनाओ में।

तुम्हारी यह मुस्कान
मुलम्मा है जिसे चढ़ा दिया
तुमने अपनी व्यथा पर
जिसे तुम छिपाना चाहते हो
समाज से
या शायद खुद से

पर मैं समझता हूँ
तुम्हारे अहसास को
कुछ खो जाने,
या ना पा सकने की कसक
मानो विफल हो गया हो
पहला प्यार ।

खूब पहचानता हूं मैं
यह तुम्हारी नहीं
सबकी व्यथा है
ऐसी स्थिति से जाने
कितनी बार लड़ा हूं
अभी जीवित हूँ
भला कहां मरा हूँ।

यह विडम्बना है कि
हर हंसते चेहरे के पीछे
एक त्रासद इतिहास है।

पर क्या यह मंजिल आखिरी है !
अरे इसके बाद भी जिंदगी है ।
हर सुबह नई उमंग है
हर रात स्वप्न नया है।

पर मंजिल उसे  मिली है
जो दुख पर विजयी हुआ।

प्रिये
कभी जो कर्तव्य पथ पर
बाधा पाओ
तो याद जरा मुझको करना
यह तुच्छ हर समय तैयार खड़ा है।

#तुम्हारी व्यथा
#शोएबवाणी

याद

अकसर चलते चलते
 मैं खो जाता हुं
कुछ पुराने निशानों में
जो बसे हैं अपनी यादों में
खुदा जाने यादें हैं सच्ची
या देखी थी केवल ख्वाबों में
कभी लगता है गुज़रा हूं 
इस खामोश जंगल से
कभी लगता है आया हूं 
इन कब्रगाहो में
कभी लगता है हर अजनबी
जाना पहचाना सा

यह यादें है गुज़री
जिंदगानी की
या फिर यह वो ख्वाब हैं ठहरे
जो गफलत दिखलाए थे रातों में
ऩा जाने कौन अकसर
रातों को बुलाता है

इस दुनिया से दूर
कहकशांओ  में
एक दुनिया नई सी है
जहां बना है एक स्वप्न महल
जहां से यह सदा आती है
जो मुझको बुलाती है
वहा कौन रहता है
जो हमको बुलाता है
वह कौन है!
और क्या उससे नाता है
शायद उससे प्यार हुआ था!
क्षितिज के उस पार
मिलने का इकरार हुआ था

उसको पा जाने को
क्षितिज की जानिब चलता हूं 
फिर भी उतनी दूर खड़ा हूं
जितना आगे बढ़ती हुं

दूर क्षितिज पर शायद तू है
 या क्षितिज है स्मृतियां तेरी
 सुर्य उदय हो या अस्त,
 उसमें दिखती है विस्मृतिया तेरी
 क्षितिज के इस पार खड़ा मैं
 देख रहा हुं नित नेम से
प्रिय तुम को बड़े प्रेम से
 हां क्षितिज के इस पार खड़ा मैं
प्रतिक्षारत लिए प्रेम के
आओ प्रियतम छोड़ क्षितिज को
 आ जाओ तुम इस पार
वरना  यह बतलादो मुझको
कहां मिलेगा  मेरा प्यार

अधूरापन

एक अधूरे स्वप्न सा
मानो जगा दिया हो 
किसी ने 
अधूरे ख्वाब में
फिर मुकम्मल नही 
हो पाती कोई चीज
सब कुछ रह जाता है 
अधूरा
अधूरा दिन 
अधूरी रात
अधूरी सुबह
अधूरी शाम
अधूरा काम 
अधूरा आराम 
अधूरी मुहब्बत 
अधूरी चाहत

अधूरी कहानी 
अधूरी नज़्म
सब कुछ
अधूरा सा लगता है 
अब अपनी जिंदगी में मुकम्मल नही होता कुछ भी अब यहाँ आखिर क्यों?
किस तरह मुकम्मल होगी दास्तान अपने गम की
#शोएबवाणी

शनिवार, 5 जनवरी 2019

व्यथा 2

एक सीप को चाहा था जिसमें सिमटा था मोती,
हर प्रयास विफल हुआ न सीप मिला, ना मोती।

एक सदफ लिए निकले थे कि कहीं मिल जाए जाम ए जम
मगर उसको भी भर कर ले गए प्याले वाले।

इस तरह बयाँ करू व्यथा अपनी
सुन कान लगा, हंसते हैं सताने वाले।

मेरे महबूब तुझे चाहने का मिला है यह सिला,
रंजो गम में हम हो रहे कतरा कतरा।

जब चले थे इस मंजिल की तरफ तो साथी थे बहुत,
अब सब ने पकड़ ली है अलग अलग राहें ।

क्या पुछते है शोएब से तुम हाल उसका,
उसके हालात कुजा उसकी बात कुजा है 

शब्दार्थ:
सदफः शराब पीने का छोटा सा प्याला
जाम ए जम : ईरान के मशहूर बादशाह जमशेद का प्याला
कूजा:भिन्न/अलग

व्यथा 1

तुम को क्या बतलाएं बंधु
एक स्वपन था
जो टूट गया
एक आभासी घरोंदा था
जो फूट गया
हाय !
अपनी व्यथा
व्यर्थ यूं हि
समय गवांया 
इन स्वपन को बुनने में
छणभर का ही
समय लगा
इस स्वपन महल को
गिरने में.
x

बुधवार, 26 दिसंबर 2018

सुनो प्रिये


 


सुनो !
मुझे एक बात कहनी है
मेरे पास ज़बान है
पर मेरे पास शब्द नही है
मौन मे अभिव्यक्त करूंगा
अपनी बात
क्या प्रिये तुम समझ पाओगी!
इस ख़ामोश अभिव्यक्ति को।

सुनो!
मैं व्यंजना में बात करता हूँ
मगर
तुम अभिधा में समझती हो
तुम्हारे और हमारे बीच
व्याकरण की यह दूरी
होने नही देती
प्रेम कविता को पूरी
लक्षणा में अगर कह दूं
तो क्या तुम समझोगी!
मेरी इस पंक्ति को



सुनो!
नहीं भाता हूँ मैं तुमको
शायद सूरत ही कुछ ऐसी हो
जो ना किसी को सुहाती हो
मगर फिर भी
मैं कहता हूँ कि
गढ़ा सब को कुदरत ने 
मैं भी उसकी
अनुपम प्रतिकृति हूँ
सौंदर्यबोध की
इस मृगतृष्णा को
गर तुमने नही छोड़ा
तो फिर कैसे समझोगी
इस अनुकृति को।


स्वप्न

हंसी मजाक के वातावरण में जब गुजर जाते हैं अनेक दिन तो प्रतीत होने लगता है वास्तविक ।  हंसी मजाक में तप कर बाहर निकलने वाला सच मानो...

tahlka