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शुक्रवार, 28 अगस्त 2026

तीन ख़त

 






किसी आदमी की ज़िंदगी में मोहब्बत कब दाख़िल होती है, इसका ठीक-ठीक पता शायद उसे भी नहीं चलता। बाद में जब वह पीछे मुड़कर देखता है तो उसे लगता है कि हाँ, यही वह मोड़ था, यहीं से रास्ता बदल गया था। मगर उस समय रास्ता बदलने की कोई आवाज़ नहीं होती। आदमी उसी तरह चलता रहता है, जैसे कल चलता था, और एक दिन पाता है कि जिस रास्ते को वह अपना समझ रहा था, वह कहीं और ले आया है।


आरमान और नायरा की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी।


वे एक-दूसरे के लिए बिल्कुल अपरिचित नहीं थे। रिश्तों की एक ऐसी परिधि में आते थे जहाँ परिचय के लिए किसी परिचय की ज़रूरत नहीं होती। एक-दूसरे को जानते थे, देखते थे, मगर जानना और पहचानना दो अलग बातें हैं। कई बार आदमी सामने वाले को वर्षों तक देखता रहता है और उसके भीतर छिपे हुए आदमी से उसका परिचय तब होता है जब किसी संयोग से दो शब्द अधिक बोलने पड़ जाएँ।


उनके बीच भी पहले दो-चार शब्द ही थे।


फिर बातचीत हुई।


फिर रोज़ होने लगी।


और फिर उस रोज़मर्रा की बातचीत में कुछ ऐसा घुल गया जिसका नाम उस समय दोनों में से किसी ने नहीं रखा था।


नायरा अपने दुखों की बातें करती। आरमान सुनता। वह कोई बड़ा आदमी नहीं था जो हर समस्या का समाधान जानता हो। मगर सुन लेने का हुनर उसमें था। शायद इसी कारण नायरा उससे बातें करती रही।


आरमान ने उसके दर्द पर एक नज़्म लिखी।


उसे यह मालूम नहीं था कि वह नज़्म किसी और के दुख पर लिखी गई थी या अपने आने वाले दुख की भूमिका थी।


एक दिन नायरा ने पूछा—


“क्या तुम मुझसे प्यार करते हो?”


आरमान ने हाँ कह दिया।


नायरा ने कहा—


“मैं तो मज़ाक कर रही थी।”


बात वहीं खत्म हो जानी चाहिए थी।


मगर कुछ बातें कही जाने के बाद वापस नहीं जातीं।


आरमान के लिए वह प्रश्न मज़ाक नहीं रहा था। उसने उस एक “हाँ” के भीतर जाने कितने भविष्य देख लिए थे।


फिर वही खट्टी-मीठी बातचीतें शुरू हुईं। रूठना, मनाना, देर रात तक जागना, छोटी बातों पर नाराज़ होना और फिर उसी नाराज़गी को भूल जाना।


मनुष्य प्रेम में कितना सरल हो जाता है।


वही आदमी जो संसार के सामने अपने विवेक का दावा करता है, एक व्यक्ति के सामने आकर इतना असहाय हो जाता है कि उसकी एक मुस्कान को तर्क और एक ख़ामोशी को फैसला समझने लगता है।


फिर एक दिन नायरा ने किसी और से शादी की बात कही।


आरमान के भीतर जैसे किसी ने अचानक दरवाज़ा बंद कर दिया।


उसने बात को समझने की कोशिश की, मगर प्रेम में समझने से पहले आदमी डरता है। उसे हर सम्भावना में वही दिखाई देता है जिससे वह सबसे ज्यादा डरता है।


बात बढ़ी।


एक कॉन्फ्रेंस कॉल हुई।


आरमान रोया।


बहुत रोया।


और उसी रात नायरा ने उसे फोन किया। उसे समझाया। उसके पास बैठी रही, उसे खाना खिलाया और कहा—


“आरमान, मैं हैरान हूँ कि आज के दौर में भी कोई इस तरह मोहब्बत कर सकता है।”


उस वाक्य ने आरमान को फिर से जीवन दे दिया।


उसे लगा था कि आदमी को प्रेमिका नहीं, केवल एक वाक्य बचा सकता है।


और फिर वे फिर साथ चलने लगे।


कुछ समय तक सब ठीक रहा।


फिर उससे भी ज्यादा ठीक।


उनकी मोहब्बत में अब वह बेफ़िक्री आ गई थी जो केवल उन लोगों में होती है जिन्हें लगता है कि वे एक-दूसरे को पा चुके हैं।


वे लड़ते थे, मगर लड़ाई में भी एक-दूसरे की जगह जानते थे।


एक रूठता तो दूसरा मनाता।


एक रोता तो दूसरा चुप कराता।


फिर एक दिन वह सीमा भी टूट गई जिसे दोनों ने कभी शब्दों में तय नहीं किया था। वे जिस्मानी तौर पर भी करीब आ गए।


उसके बाद प्रेम पहले जैसा नहीं रहा।


वह अधिक गहरा था, मगर अधिक नाज़ुक भी।


क्योंकि अब खोने के लिए बहुत कुछ था।


और जहाँ बहुत कुछ खोने को हो, वहाँ आदमी हर आहट को ख़तरा समझता है।


परिवार बीच में आने लगे।


लोगों की बातें आने लगीं।


किसी ने कुछ कहा, किसी ने कुछ समझा, किसी ने किसी से कुछ सुना।


सच क्या था और वह सच किसके पास था—यह धीरे-धीरे महत्वहीन हो गया।


महत्वपूर्ण केवल इतना रह गया कि दोनों के बीच विश्वास कमजोर पड़ने लगा।


आरमान ने पहली बार एक लंबा ख़त लिखा।


वह ख़त प्रेमिका को कम और अपने टूटते हुए विश्वास को अधिक लिखा गया था।


उसने लिखा—


---


[पहला ख़त]


«तुम्हारे ड्रामे तुम्हें ही मुबारक।


हम नॉवेल लिखेंगे—ऐसे नॉवेल, जो मेरे बाद भी तुम्हें तुम्हारी याद दिलाते रहेंगे।


तुम्हारी हरकत अच्छी नहीं थी। मगर चाहकर भी तुमसे नफ़रत नहीं कर सकता। आख़िर तुमसे मोहब्बत की है। और जो मोहब्बत मैंने तुमसे की है, वह अब नफ़रत में नहीं बदल सकती—मरते दम तक नहीं।


तुम चाहो तो ऐसे अनगिनत ड्रामे कर सकती हो। मुझे तुमसे कोई गिला नहीं है। न नफ़रत है, न कभी होगी।


हाँ, ख़ुद पर ज़रूर अफ़सोस रहेगा कि............


ख़ैर, मैं ड्रामे नहीं करता।


मैं कल से ही बीमार हूँ, मगर तुम्हारे प्रति अपनी आसक्ति ने बुख़ार में भी तुम्हें मैसेज करने पर मजबूर कर दिया।


न मैंने तुम्हें छोड़ा है, न तुम्हारे साथ कोई बेवफ़ाई की है। मेरे लिए पहला प्यार भी तुम थी, आख़िरी प्यार भी तुम हो—और रहोगी।


तुम मुझे मिलो—जिसकी उम्मीद अब न के बराबर है—या न मिलो, मैंने तुम्हें हमेशा के लिए अपने भीतर संजोकर रखने का फैसला कर लिया है।


मैंने अपनी कहानी के ऊपर एक और कहानी लिखने का फैसला किया है।


उसमें कोशिश करूँगा कि हर उस बात का जवाब दूँ, जो कभी तुम्हारे इल्ज़ाम बने—ख़ाला की दी हुई बातों से लेकर मामू की बातों तक, तुम्हारी कामुकता से लेकर मेरी ख़ामोशी और मेरे डरपोकपन तक।


सब कुछ होगा।


और शायद उसके बाद ही मेरी ज़िंदगी का फैसला होगा।


मैं अपने अल्लाह की कसम खाकर कहता हूँ कि मैंने न तो फ़ैज़ान से कभी कुछ कहा, न हमज़ा और नायरा से, न किसी और से।


न मैंने कभी किसी से कहा कि मेरा तुम्हारे साथ कोई मैटर है।


मैं अल्लाह की कसम खाकर यह भी कहता हूँ कि मैंने न कभी किसी का बुरा चाहा, न सोचा।


और अल्लाह की कसम खाकर यह भी कहता हूँ कि मुझे जितना तुमसे प्यार है, उतना ही तुमसे डर भी है। शायद इसी वजह से मैं अक्सर तुमसे बात करने में भी ख़ौफ़ खाता रहा।


मैं अल्लाह की कसम खाकर कहता हूँ कि मैंने तुम्हें लेकर कभी कोई ग़लत सोच या इरादा नहीं रखा।


अब अगर मैं कोई कदम उठाता हूँ या आगे कुछ करता हूँ, तो उसकी तुम्हारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं होगी। न ही अब तुम पर मेरा कोई हक़ है, न तुम पर मेरी कोई ज़िम्मेदारी है।


मैं अपनी बात और अपने हर काम के लिए ख़ुद ज़िम्मेदार हूँ।


बस इतना ही कहना था।


ख़ुदा तुम्हें हमेशा ख़ुश रखे।


अल्लाह हाफ़िज़।»


---


ख़त भेज दिया गया।


मगर प्रेम की एक अजीब आदत है—वह आदमी के भेजे हुए ख़त का इंतज़ार नहीं करता, बल्कि उसके जवाब का इंतज़ार करवाता है।


और जवाब आया।


फिर बातचीत हुई।


फिर मुलाक़ातें हुईं।


फिर वही प्रेम लौट आया जिसे आरमान ने समझा था कि वह खो चुका है।


यही तो मोहब्बत की सबसे बड़ी चाल है।


वह टूटकर आदमी को यक़ीन दिलाती है कि अब कुछ नहीं बचा, फिर उसी टूटे हुए आदमी को दो मीठे शब्द देकर अपने पुराने घर में वापस बुला लेती है।


आरमान लौट आया।


इस बार पहले से अधिक डूबा हुआ।


दोनों ने फिर अपने भविष्य की बातें कीं।


कभी शादी की।


कभी घर की।


कभी नौकरी की।


कभी उस छोटे-से संसार की जहाँ दुनिया की दखल न हो।


आरमान ने शायद अपने भविष्य को नायरा के चेहरे से जोड़ दिया था।


उसे लगता था कि आदमी का भविष्य कोई तारीख नहीं, एक व्यक्ति होता है।


मगर नायरा के भीतर कुछ धीरे-धीरे बदल रहा था।


यह बदलाव किसी घोषणा के साथ नहीं आया।


वह बातचीत के बीच आया।


जवाबों की लंबाई में आया।


ख़ामोशियों में आया।


कभी वह आरमान के पास होती और फिर अचानक इतनी दूर चली जाती कि आरमान को अपनी ही मोहब्बत पर शक होने लगता।


वह पूछता—


“क्या हुआ?”


नायरा कहती—


“कुछ नहीं।”


और प्रेम में “कुछ नहीं” अक्सर सबसे बड़ा “कुछ” होता है।


आरमान फिर भी बना रहा।


उसे विश्वास था कि मोहब्बत केवल दूरी से खत्म नहीं होती।


उसने अपने मन को समझाया कि हर रिश्ते में ऐसे दौर आते हैं।


फिर एक दिन उसने दूसरा ख़त लिखा।


पहले ख़त में शिकायत थी।


दूसरे में स्मृति।


पहले में बचाने की कोशिश थी।


दूसरे में अपने पूरे रिश्ते को एक बार फिर समझ लेने की बेचैनी।


उसने लिखा—


---


[दूसरा ख़त]


«प्रियतमा,


उम्मीद है तुम खैरियत से होंगी। मैं आज भी तुम्हारे बैचेन और उदास हूं। और अपने बाते लम्हात याद कर रहा हूं।


मैं यह तो नहीं कह सकता है कि मैंने तुम्हें पहली बार तुम्हें तब देखा और तुम्हारी मुहब्बत में गिरफ्तार होगया। क्योंकि मैं तो तुम्हें अपने आखिरी याद को टटोलता हूं तो वहां भी पाता हूं। आज मुझे तुमसे मुहब्बत है हद से ज्यादा है। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था और 2019 से पहले तो मैं सोच सकता भी नहीं था।


असल कहानी शुरू होती है 2018 से। जब से मैं तुमसे व्हटअप पर जुड़ा और बात शुरू हुई।


हांलांकि ये बातें सिर्फ नोर्मल थी जोकि कजन आपस में कर लेते हैं‌। तब भी तुम्हें में उस नजरिए से नही सोचता था। मैने इसी दौरान तुम्हारे दर्द को महसूस किया।‌ इस पर मैंने एक नज़्म भी लिखी।


फिर एक दिन तुमने मैसेज किया कि क्या तुम मुझसे प्यार करते हो? यह वोह वक्त‌ जब मैं तुम्हारी जानिब माइल हो चुका था।


मैने कहा 'हां' और तुमने कहा कि मैं तो मज़ाक कर रही थी। लेकिन मैं तुम्हारी मुहब्बत में गिरफ्तार हो चुका था।


ऐसे ही खट्टी-मीठी बातों के साथ वक्त बीता और फिर ग़लबन 2020 में फिर आया वक्त जिस जिन वो घटना हुई कि तुम मुझे कहती हो कि मैंने तुम्हारा प्यार छीन लिया।


एक दिन तुमने कहा कि मैं तो‌ अदनान से शादी करूंगी। इत्तेफाक से उस शाम को अदनान आया और बाजी ने कहा मुमानी का नम्बर दियो कुछ बात करनी है। मुझे लगा कि तुमने अदनान से बात‌ करके बाजी से कहा होगा तभी तो बाजी बात करने के नम्बर मांग रही हैं। मैने तुम्हे मैसेज करा और उसके बाद हुई लड़ा मेरे तुम्हारी और अदनान की कांफ्रेंस काल पर खत्म हुई। मैं बहुत रोया , तुमने कॉल करके बात करी तसल्ली और खाना खिलवाया और मुझे आज भी याद है तुमने कहा था कि आरमान मैं हैरान हूं कि आज के दौर में भी इस तरह मुहब्बत कर सकता है।


इसके बाद मैं तुम्हारे मुहब्बत के दरिया में डूबता चला गया। हम बात करते रहे लड़ते रहे, रोते रहे।


मैं लड़ता तो तुम रो देती और तुम लड़ ती तो मैं मना लेता था। वक्त गुजारा गया और हमारी मोहब्बत और गहरी होता गई और फिर वो हुआ जो नहीं होना था। हम जिस्मानी तौर पर भी करीब आ गए।


और तुम...... तुम्हें लगता है कि इस बात का दुख सिर्फ तुम्हें ही है। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा। ऐसा नहीं है


बताओ मैं क्या करता ? और तब भी क्या कर लिया सब कदम तुमने खुद अपनी मर्जी से उठाए, मैं जब भी आया तुम जा चुकी।


मुझे भी तुम्हारा जितना दुख है। मैं आज भी रातों को सो नहीं पाता हूं।


प्रिय मैंने तुमसे मुहब्बत कोई व्यापार के तौर पर नहीं की है। मैं तुम्हें अपने दिल और रूह की गहराई से चाहता हूं। मैं अपनी सारी जिंदगी तुम्हारे पहेलू में गुजार देना चाहता हूं। तुम्हें खुद अंदाजा है मेरी मुहब्बत का।


अगर तुम्हें मुझसे कोई शिकायत है तो‌ बताओ। मैंने कब तुम्हारी बात को काटा है।


आखिर तुमसे मुहब्बत की है। अब ये नफरत में नहीं बदल सकती मरते दम तक


न ही नफरत है न ही होगी। हां ख़ुद पर ज़रूर अफसोस रहेगा कि............


न मैने तुम्हें छोड़ा न हि कोई बेवफाई की है। मेरे लिए पहल प्यार आख़िरी प्यार दोनो तुम थी हो और रहोगी।


तुम मुझे मिलों(इसकी उम्मीद अब न की बराबर हैं) या न मिलो, मगर मेने तुम्हें हमेशा के लिए संजो कर रखने का फैसला कर लिया है।


मैं अल्लाह की कसम खा कर यह भी कहता हूं कि मैंने न कभी किसी का बुरा चाहा और न ही सोचा


मैं अल्लाह की कसम खा कर यह भी कहता हूं मुझे जितना तुमसे प्यार है उतना ड़र भी है। इसी वजह से मैं अकसर तुमसे बात करने में खौफ भी खाता हूं।


मैं अल्लाह की कसम खा कर यह भी कहता हूं कि मैंने कभी तुम्हे लेकर कभी भी कोई गलत सोच या इरादा नही रहा।


मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं। ऐसा कोई दिन कोई नमाज़ नहीं गई जिसमें मैंने तुम्हें न मांगा हो। मगर अब मेरा हौसला पस्त हो रहा है। मेरी हिम्मत जवाब दे रही है। सारी रात वहटस अप पर तुम्हारा नम्बर खोल कर इंतजार करता रहता हूं कि तुम अनब्लॉक करके कहोगी कि पागल मैं तो मज़ाक कर रही थी तू तो मेरी नस-नस में बसा है। मगर मुद्दत हो गई इंतजार करते-करते। आंखें रोते रोते मंद पड़ गई मगर तुमने अनब्लॉक नहीं किया। पिछले दो हफ्ते में सिर्फ दो दिन सोया हूं वो भी नींद की दवाई खाने के बाद।


मैं तुम्हारे गम में घुला जा रहा और तुम हो कि तुम्हे कोई अहसास ही नहीं है।


खुदाया ऐसी बेहिस मत बनो, मुझ पर इस तरह जुल्म न करों। मान भी जाओ। नौकरी करके तुम्हारा और अपना खर्च उठा लुंगा। प्लीज़ तुम इंकार मत करना मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूं और हमेशा करता रहूंगा यहां तक कि मैं मर जाउ या कयामत‌ आ जआए।


तुम हमेशा मेरे दिल मेरी यादों में बसी रहोगी।मैं हमेशा इतंजार करता रहूंगा।


दिल को है तेरी तमन्ना, दिल को है तुमसे ही प्यार


तू आए या न आए हम करेंगे इंतजार।


तुम्हारा मुंतजिर


तुम्हारा पागल जोगी


हाँ दिल का दामन फैला है


क्यूँ गोरी का दिल मैला है


हम कब तक पीत के धोके में


तुम कब तक दूर झरोके में


कब दीद से दिल को सेरी हो


इक बार कहो तुम मेरी हो


क्या झगड़ा सूद ख़सारे का


ये काज नहीं बंजारे का


सब सोना रूपा ले जाए


सब दुनिया, दुनिया ले जाए


तुम एक मुझे बहुतेरी हो


इक बार कहो तुम मेरी हो»


---


इसके बाद कहानी में वह समय आया जिसे आरमान बाद में अपने जीवन का सबसे लंबा समय कहता था।


नायरा अब पहले जैसी नहीं थी।


वह पूरी तरह आरमान से अलग भी नहीं हुई थी, मगर उसके भीतर किसी और के लिए जगह बन रही थी।


पहले उस जगह का नाम नहीं था।


फिर उसका नाम साहिल हुआ।


साहिल कोई तूफ़ान बनकर नहीं आया।


वह धीरे-धीरे आया।


बातों में।


साथ में।


सुविधा में।


और फिर शायद उस भरोसे में जिसकी आरमान से नायरा को कभी-कभी शिकायत रहती थी कि वह उसे दे नहीं पाया।


आरमान को देर से पता चला।


जब पता चला तो उसने पहले यक़ीन नहीं किया।


फिर उसने अपने सामने रखे हुए सच से आँखें चुराईं।


मगर सच से आँखें चुराने का मतलब यह नहीं कि सच गायब हो जाता है।


नायरा अब किसी दूसरे आदमी की ओर बढ़ रही थी।


यह बात आरमान को इसलिए नहीं तोड़ रही थी कि कोई दूसरा उसकी जगह ले रहा था।


उसे इसलिए तोड़ रही थी कि नायरा स्वयं अपनी जगह बदल रही थी।


जिस लड़की ने कभी उससे कहा था कि वह उसकी नस-नस में बसी है, वही अब किसी और की दुनिया में अपना घर बना रही थी।


आरमान के पास पुराने वाक्य थे।


साहिल के पास नया समय।


आरमान के पास यादें थीं।


साहिल के पास भविष्य।


और भविष्य की ताक़त हमेशा अजीब होती है। वह स्मृतियों को पराजित नहीं करता, बस उनके लिए जगह कम कर देता है।


नायरा ने धीरे-धीरे स्वयं को साहिल के हवाले कर दिया।


आरमान को अब यह समझने में देर नहीं लगी कि प्रेम में कभी-कभी आदमी हारता नहीं है—बस सामने वाला उसके बिना आगे बढ़ जाता है।


वह अकेला रह गया।


उसके कमरे में अब भी वही फोन था।


वही पुरानी चैटें थीं।


वही तस्वीरें थीं।


वही डायरी थी।


लेकिन वह लड़की नहीं थी।


और शायद अब लौटने की कोई जगह भी नहीं थी।


आरमान ने बहुत दिनों तक कुछ नहीं लिखा।


फिर एक रात उसने तीसरा ख़त उठाया।


इस बार उसके पास कहने को बहुत कुछ था।


मगर पहली बार उसे मालूम था कि कह देने से कुछ बदलेगा नहीं।


उसने लिखा—


---


[तीसरा ख़त]


«सच कहु तो मुझे उम्मीद नहीं थी तू ऐसा करेगी।


अब तक मैंने वफ़ादारी करी कभी किसी और के बारे में सोचा तक नहीं।


लेकिन हक़ीक़त बात यही है कि एकतरफ़ा मोहब्बत एकतरफ़ा ही रहती है। कोई तुम्हारी ज़िद से तुम्हारी तरफ़ माइल हो भी जाए तो भी वह मौका पाकर छोड़ ही देता है।


अब मुझे यक़ीन है कि इस दुनिया में मोहब्बत जैसा कुछ नहीं, बस एक भरम है।


जो नज़्में मैंने तुम्हारे से पहले लिखी थीं, सब relevant हो गई हैं।


मेरे ब्लॉग पर सब है, तुम्हारे नाम लिखे दो ख़त भी.. जो कभी publish नहीं किए हैं..


काश तुम पढ़ पाती...


मगर नहीं, कभी नहीं।


अब तुम उन्हें कभी नहीं पढ़ पाओगी।


मेरी ज़िंदगी में मेरा सरमाया सिर्फ़ मोहब्बत था, वह भी नहीं रहा..


तुम्हारे अपनों ने ख़ासकर ख़ाला और मामू ने मना किया, मैंने नहीं माना।


मेरा दिल अब भी गवारा नहीं करता कि मैं मानूँ...


लेकिन सच्चाई और सच से मैं मुँह नहीं मोड़ सकता हूँ। न तो वह तस्वीर fake है, न chat।


ख़ैर, तुमने जो भी किया, सोच-समझकर अपने भले के लिए ही किया होगा..


8 साल का अरसा बहुत होता है, आसान नहीं होता है ना, छोड़ना ना हो भूलना।


ख़ैर, ये दिन भी कट जाएंगे।»


---


आरमान ने ख़त पूरा किया।


कुछ देर उसे पढ़ा।


फिर डायरी बंद कर दी।


इस बार उसने उसे भेजा नहीं।


क्योंकि कुछ ख़त ऐसे होते हैं जिन्हें डाक की ज़रूरत नहीं होती।


वे लिखे ही इसलिए जाते हैं कि आदमी अपने भीतर जमा आवाज़ को बाहर निकाल सके।


उस रात आरमान बहुत देर तक खिड़की के पास बैठा रहा।


शहर सो रहा था।


किसी दूसरे घर में शायद नायरा जाग रही थी।


शायद साहिल से बात कर रही थी।


शायद आने वाले दिनों की कोई योजना बना रही थी।


और यह विचार आरमान के लिए अजीब तरह से कड़वा था कि जिस भविष्य की कल्पना उसने आठ वर्षों तक की, वह भविष्य अब किसी और के साथ लिखा जा रहा है।


लेकिन जीवन को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि हमने उसकी कितनी अच्छी योजना बनाई थी।


वह अपनी गति से चलता रहता है।


सुबह हुई।


आरमान ने तीनों ख़त एक साथ रखे।


पहले ख़त में वह आदमी था जिसे डर था कि उसकी मोहब्बत उससे छिन रही है।


दूसरे में वह आदमी था जिसे विश्वास था कि मोहब्बत अभी बची हुई है।


तीसरे में वह आदमी था जिसने पहली बार स्वीकार किया था कि मोहब्बत बची रह सकती है, मगर रिश्ता नहीं।


उसने तीनों ख़तों को एक फ़ाइल में रख दिया।


ऊपर कोई नाम नहीं लिखा।


बस इतना लिखा—


“उसके नाम, जिसे मैंने खोकर पाया कि मैं कौन था।”


फिर उसने कलम उठाई और एक आख़िरी पंक्ति लिखी—


“वह किसी और की हो गई। मैं उसके विरह का हो गया।”


और शायद यही इस कहानी का सबसे कठिन सच था।


नायरा ने अपनी ज़िंदगी चुन ली थी।


आरमान ने अपनी यादें।


वह किसी दूसरे के घर की रोशनी बन गई।


आरमान अपनी मेज़ पर बैठकर उन अँधेरी रातों का लेखक बन गया जिनमें वह रोशनी कभी आया करती थी।


मोहब्बत का अंत हमेशा मिलन या बिछड़ना नहीं होता।


कभी-कभी उसका अंत यह होता है कि एक व्यक्ति जीवन में आगे बढ़ जाता है और दूसरा पीछे रहकर उस रास्ते की धूल में अपने पुराने पदचिह्न खोजता रहता है।


आरमान भी खोजता रहा।


फिर एक दिन उसने खोज बंद कर दी।


भूलने के लिए नहीं।


बल्कि इसलिए कि उसे समझ आ गया था—


कुछ लोगों को ज़िंदगी से विदा किया जा सकता है, यादों से नहीं।


और कुछ प्रेम कहानियाँ दो लोगों की नहीं रहतीं।।

विरह पत्र

 

सच कहूँ तो मुझे उम्मीद नहीं थी कि तुम ऐसा करोगी।


अब तक मैंने पूरी वफ़ादारी से तुम्हें चाहा। कभी किसी और के बारे में सोचा तक नहीं। शायद इसी वजह से आज जो कुछ सामने आया है, उसे स्वीकार करना मेरे लिए इतना आसान नहीं है।


लेकिन एक बात अब समझ में आ गई है—एकतरफ़ा मोहब्बत, आख़िर एकतरफ़ा ही रहती है। कोई अपनी ज़िद, अपनी कोशिशों और अपने प्यार से तुम्हारी तरफ़ थोड़ा झुक भी जाए, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह हमेशा वहीं रहेगा। एक दिन उसे भी कोई ऐसा मोड़ मिल जाता है, जहाँ से वह लौटकर नहीं आता।


आज मुझे लगता है कि इस दुनिया में मोहब्बत जैसा शायद कुछ है ही नहीं… शायद यह भी एक खूबसूरत-सा भ्रम है, जिसे इंसान सच समझकर पूरी ज़िंदगी जीता रहता है।


तुमसे पहले मैंने जो नज़्में लिखी थीं, आज उनमें से हर एक फिर से प्रासंगिक लग रही है। मेरे ब्लॉग पर बहुत कुछ लिखा है—तुम्हारे नाम लिखे हुए दो ख़त भी हैं, जिन्हें मैंने कभी प्रकाशित नहीं किया।


काश… तुम उन्हें पढ़ पाती।


मगर अब शायद कभी नहीं।


अब तुम उन्हें कभी नहीं पढ़ पाओगी।


मेरी ज़िंदगी में अगर कोई असली सरमाया था, तो वह मोहब्बत थी। और आज ऐसा लग रहा है जैसे वह भी मेरे पास नहीं रही।


तुम्हारे अपनों ने मुझे बहुत पहले मना किया था। मैंने उनकी बात नहीं मानी। मेरा दिल आज भी पूरी तरह यह मानने को तैयार नहीं है कि जो कुछ मैंने देखा और जाना, वही सच है।


लेकिन सच से मुँह भी नहीं मोड़ा जा सकता।


न वह तस्वीर झूठी लगती है, न वह चैट।


ख़ैर… तुमने जो भी किया होगा, सोच-समझकर अपने भले के लिए ही किया होगा। मैं तुम्हें इसके लिए दोष नहीं दूँगा।


बस इतना है कि आठ साल कोई छोटा अरसा नहीं होता।


आठ सालों को छोड़ना आसान नहीं होता…

उन्हें भूलना तो और भी मुश्किल है।


लेकिन शायद ज़िंदगी का यही दस्तूर है—

कुछ लोग पूरी ज़िंदगी के लिए नहीं आते,

कुछ लोग हमें पूरी ज़िंदगी के लिए याद रहने के लिए मिलते हैं।


मैं नहीं जानता आगे क्या होगा।


बस इतना जानता हूँ कि ये दिन भी कट जाएँगे।


और शायद एक दिन मैं तुम्हें याद करके दुखी होने के बजाय सिर्फ़ इतना कह पाऊँगा—


“हाँ, कभी मैंने उसे बहुत मोहब्बत की थी।”

गुरुवार, 27 अगस्त 2026

वह फिर नहीं आएगी

 

वह फिर नहीं आएगी

उसने पूछा था—
“क्या खाली रहते हो?”
मैंने कहा—“हाँ।”

उसने मुझे काम में लगा दिया।
मैं इतना काम में लगा कि
उसके लिए ही वक़्त कम पड़ने लगा…
और वह उसी वजह से
मुझे हमेशा के लिए छोड़कर चली गई।

कभी-कभी लगता है,
अभी पीछे से उसकी आवाज़ आएगी—
“मैं आ गई…”

जानता हूँ,
अब ऐसा नहीं होने वाला।
मगर इस मन को कौन समझाए?

कुछ आवाज़ें कानों से नहीं,
यादों से सुनी जाती हैं…
और कुछ इंतज़ार ऐसे होते हैं
जिनका लौटकर आना मुमकिन नहीं होता।

ज़िंदगी के सफ़र में
गुज़र जाते हैं जो मकाँ,
वो फिर नहीं आते…

और शायद कुछ लोग भी
उन मकानों जैसे होते हैं—
जिनसे हम आगे तो निकल जाते हैं,
मगर उम्र भर
पीछे मुड़कर देखते रहते हैं।

रविवार, 9 अगस्त 2026

क्या लोकतंत्र में विरोध की आवाज़ को राजधानी से दूर किया जा सकता है?

 

क्या लोकतंत्र में विरोध की आवाज़ को राजधानी से दूर किया जा सकता है?

Jantar Mantar पर उठे सवाल के बीच असहमति, सार्वजनिक व्यवस्था और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन की बहस

दिल्ली के Jantar Mantar को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में हालिया सुनवाई ने एक पुराने लेकिन बेहद महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न को फिर सामने ला दिया है—लोकतंत्र में विरोध की आवाज़ कहाँ सुनी जाएगी?

हालिया सुनवाई के दौरान अदालत ने Jantar Mantar को प्रदर्शन स्थल के रूप में जारी रखने के औचित्य पर सवाल उठाते हुए पूछा कि इसे protest site के रूप में बंद क्यों नहीं किया जा सकता। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि यह अभी कोई अंतिम closure order नहीं है। लेकिन न्यायालय की टिप्पणी ने उस बहस को अवश्य तेज कर दिया है कि राजधानी के हृदय में होने वाले प्रदर्शनों से पैदा होने वाली असुविधा और नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

यह केवल Jantar Mantar का प्रश्न नहीं है। यह उस लोकतांत्रिक सिद्धांत का प्रश्न है जिसमें सरकार के सामने असहमति व्यक्त करने के लिए नागरिक को एक वास्तविक, प्रभावी और सुलभ सार्वजनिक स्थान मिलना चाहिए।

भारत का लोकतंत्र और विरोध की परंपरा

भारत में विरोध प्रदर्शन कोई आधुनिक राजनीतिक फैशन नहीं है।

स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आज तक सभा, जुलूस, धरना, सत्याग्रह और जनआंदोलन भारतीय लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा रहे हैं। गांधी का सत्याग्रह हो, किसान आंदोलन हों, मजदूरों के संघर्ष हों, छात्र आंदोलन हों या भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन—जनता ने सत्ता के सामने अपनी बात रखने के लिए सार्वजनिक स्थानों का सहारा लिया है।

संविधान ने इसी लोकतांत्रिक परंपरा को Article 19(1)(a) और Article 19(1)(b) के माध्यम से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार का संरक्षण दिया है।

हालाँकि ये अधिकार निरपेक्ष नहीं हैं। Article 19(2) और 19(3) के तहत राज्य reasonable restrictions लगा सकता है। Public order, security, traffic management और अन्य नागरिकों के अधिकार भी संवैधानिक महत्व रखते हैं।

इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि प्रदर्शन पर कोई प्रतिबंध लगाया जा सकता है या नहीं।

प्रश्न यह है कि प्रतिबंध की सीमा क्या होनी चाहिए?

Boat Club से Jantar Mantar तक

दिल्ली का राजनीतिक भूगोल स्वयं विरोध की बदलती हुई कहानी कहता है।

एक समय Boat Club और Central Delhi के आसपास के क्षेत्र बड़े जनआंदोलनों के प्रमुख केंद्र हुआ करते थे। 1988 में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में किसानों का विशाल आंदोलन इसका एक ऐतिहासिक उदाहरण है।

बाद के वर्षों में Central Delhi में बड़े प्रदर्शनों पर सुरक्षा और प्रशासनिक नियंत्रण बढ़ता गया और Jantar Mantar एक महत्वपूर्ण designated protest space के रूप में सामने आया।

इसलिए Jantar Mantar को केवल एक सड़क या प्रदर्शन स्थल के रूप में देखना अधूरा होगा।

दशकों से यह स्थान जनता, मीडिया और सत्ता के बीच एक सार्वजनिक संवाद का प्रतीक बन चुका है।

Anna Hazare के आंदोलन से लेकर किसान, कर्मचारी, छात्र और विभिन्न सामाजिक आंदोलनों तक—Jantar Mantar ने असहमति को सार्वजनिक दृश्यता देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण दृष्टिकोण

Jantar Mantar के संबंध में सुप्रीम कोर्ट पहले ही एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत स्पष्ट कर चुका है।

Mazdoor Kisan Shakti Sangathan v. Union of India, 2018 में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष Central Delhi में शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर लगाए गए प्रतिबंधों और Jantar Mantar में demonstrations पर रोक का प्रश्न आया था। अदालत ने विरोध के अधिकार और क्षेत्र के निवासियों के शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार के बीच संतुलन की आवश्यकता पर जोर दिया।

निर्णय का महत्वपूर्ण संदेश यह था कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रदर्शन को regulate किया जा सकता है, लेकिन केवल असुविधा के आधार पर peaceful protest को पूरी तरह समाप्त करना संवैधानिक दृष्टि से उचित समाधान नहीं माना जा सकता।

अदालत ने यह भी संकेत दिया कि संख्या, समय, सुरक्षा, संवेदनशील सरकारी प्रतिष्ठानों से दूरी, traffic और अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए guidelines बनाई जा सकती हैं। यानी regulation और prohibition में अंतर है।

यही अंतर आज Jantar Mantar की बहस में सबसे महत्वपूर्ण है।

क्या लोकतंत्र में protest को राजधानी के किनारे भेज देना समाधान है?

दुनिया की अनेक लोकतांत्रिक राजधानियों में राजनीतिक protest और सत्ता के केंद्र के बीच एक भौगोलिक संबंध दिखाई देता है।

London में Parliament Square इसका एक उदाहरण है। वहाँ भी प्रदर्शन unrestricted नहीं हैं। सुरक्षा, traffic, समय और अन्य regulatory conditions लागू हो सकती हैं।

लेकिन यह विचार अपने आप में लोकतंत्र-विरोधी नहीं माना जाता कि नागरिक Parliament के निकट अपनी राजनीतिक असहमति व्यक्त करें।

लोकतांत्रिक व्यवस्था का उद्देश्य यह नहीं होना चाहिए—

“Protest करो, लेकिन ऐसी जगह जहाँ तुम्हारी आवाज़ सत्ता और जनता दोनों से दूर रहे।”

बेहतर सिद्धांत यह है—

“Protest करो, लेकिन reasonable regulation के साथ।”

Jantar Mantar बंद हुआ तो सबसे अधिक असर किस पर पड़ेगा?

यदि Jantar Mantar को समाप्त कर दिया जाता है और उसकी जगह कोई ऐसा वास्तविक alternative नहीं दिया जाता जो समान रूप से accessible, visible और politically effective हो, तो इसका प्रभाव केवल बड़े राजनीतिक संगठनों पर नहीं पड़ेगा।

इसका प्रभाव उस किसान पर पड़ेगा जिसके पास दिल्ली में स्थायी संसाधन नहीं हैं।

उस छात्र पर पड़ेगा जो अपनी शिक्षा से जुड़ी समस्या लेकर राजधानी आता है।

उस मजदूर पर पड़ेगा जिसकी आवाज़ किसी corporate press conference तक नहीं पहुँच सकती।

उस छोटे कर्मचारी पर पड़ेगा जो अपनी सेवा-संबंधी समस्या लेकर सरकार तक पहुँचना चाहता है।

और उस सामान्य नागरिक पर पड़ेगा जिसके पास न बड़ा संगठन है, न social-media machinery और न ही राष्ट्रीय स्तर पर अपनी बात रखने के अन्य साधन।

लोकतंत्र में हर नागरिक के पास सत्ता तक पहुँचने के समान साधन नहीं होते।

इसीलिए सार्वजनिक protest space का महत्व केवल geographical नहीं, बल्कि democratic accessibility का प्रश्न भी है।

कई बार सड़क उस नागरिक की संसद बन जाती है जिसकी आवाज़ संसद तक नहीं पहुँचती।

लेकिन क्या protestors को unlimited अधिकार प्राप्त है?

बिल्कुल नहीं।

लोकतंत्र में एक अधिकार दूसरे नागरिक के अधिकार को नष्ट नहीं कर सकता।

यदि किसी प्रदर्शन के कारण emergency services बाधित हों, अस्पतालों तक पहुँच प्रभावित हो, स्थानीय निवासियों का जीवन असहनीय हो जाए, यातायात पूरी तरह ठप हो जाए या सार्वजनिक सुरक्षा को वास्तविक खतरा पैदा हो, तो राज्य के पास regulation करने का संवैधानिक आधार मौजूद है।

लेकिन इसका उत्तर केवल यह नहीं हो सकता—

“समस्या है, इसलिए protest venue ही समाप्त कर दो।”

इसके स्थान पर कई कम restrictive उपाय उपलब्ध हो सकते हैं—

  • प्रदर्शनकारियों की निर्धारित संख्या;
  • निश्चित समय-सीमा;
  • emergency corridor;
  • barricading और controlled entry;
  • sound restrictions;
  • sanitation और waste-management व्यवस्था;
  • पुलिस supervision;
  • advance intimation/permission mechanism;
  • sensitive security zones के लिए स्पष्ट दूरी;
  • peak traffic hours में सीमित गतिविधि;
  • और genuine public-safety concerns के लिए temporary restrictions।

अर्थात—

Regulation हो, elimination नहीं।

असली सवाल Jantar Mantar बंद करने का नहीं, विकल्प का है

यदि सरकार या प्रशासन का मानना है कि Jantar Mantar अब राजधानी के लिए उपयुक्त protest venue नहीं है, तो अगला प्रश्न स्वतः पैदा होता है—

विकल्प क्या है?

क्या वह स्थान आसानी से पहुँचा जा सकेगा?

क्या वहाँ Metro और public transport की पर्याप्त सुविधा होगी?

क्या वहाँ पर्याप्त capacity होगी?

क्या मीडिया और आम जनता वहाँ पहुँच सकेंगे?

क्या वहाँ protest करने से उसकी राजनीतिक और सार्वजनिक visibility बनी रहेगी?

क्या वह स्थान राजधानी के decision-making institutions से इतना दूर तो नहीं होगा कि protest केवल औपचारिक गतिविधि बनकर रह जाए?

और सबसे महत्वपूर्ण—

क्या उस स्थान पर नागरिक की आवाज़ वास्तव में सरकार तक पहुँचेगी?

यदि alternative ऐसा है जहाँ प्रदर्शन तो किया जा सकता है लेकिन वहाँ न मीडिया पहुँचता है, न जनता और न ही decision-makers, तो कागज़ पर protest की अनुमति देना और वास्तविक लोकतांत्रिक अधिकार उपलब्ध कराना—दो अलग बातें हो जाती हैं।

लोकतंत्र में असहमति nuisance नहीं है

यह भी समझना आवश्यक है कि peaceful protest हमेशा सुविधाजनक नहीं होता।

लोकतांत्रिक असहमति अक्सर असुविधाजनक होती है।

यदि हर protest को केवल traffic, noise या inconvenience के चश्मे से देखा जाएगा, तो लोकतांत्रिक विरोध की प्रकृति ही बदल जाएगी।

दूसरी ओर, protesters को भी यह समझना होगा कि उनके अधिकारों के साथ दूसरों के अधिकार जुड़े हुए हैं।

इसलिए सही constitutional approach किसी एक पक्ष को पूर्ण विजय देना नहीं, बल्कि proportionality और balancing के माध्यम से दोनों पक्षों के अधिकारों को यथासंभव सुरक्षित रखना है।

सुप्रीम कोर्ट का Mazdoor Kisan Shakti Sangathan निर्णय इसी balancing approach की ओर संकेत करता है। अदालत ने protestors के अधिकार और residents के अधिकार—दोनों को स्वीकार करते हुए regulation की आवश्यकता पर बल दिया था।

राजधानी की शांति और लोकतंत्र की आवाज़—दोनों आवश्यक हैं

दिल्ली केवल देश की राजधानी नहीं है।

यह वह स्थान है जहाँ देश के राजनीतिक निर्णय लिए जाते हैं। इसलिए यह स्वाभाविक है कि देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले नागरिक अपनी समस्याओं को राष्ट्रीय सत्ता के केंद्र तक पहुँचाना चाहें।

इसका अर्थ यह नहीं कि Parliament के हर दरवाजे के सामने कभी भी कोई भी प्रदर्शन किया जाए।

Security और public order की अपनी अनिवार्य सीमाएँ हैं।

लेकिन इसका दूसरा अर्थ यह भी नहीं हो सकता कि नागरिकों को राजधानी के ऐसे दूरस्थ हिस्से में भेज दिया जाए जहाँ protest की visibility और effectiveness दोनों समाप्त हो जाएँ।

एक संवैधानिक लोकतंत्र का रास्ता इन दोनों अतियों के बीच है।

न प्रतिबंधहीन अराजकता, न पूर्ण निषेध।

नuisance नहीं, regulation।

न elimination, बल्कि constitutional balance।

निष्कर्ष: जनता की आवाज़ के लिए जगह बची रहनी चाहिए

Jantar Mantar को लेकर चल रही बहस को केवल एक traffic-management dispute के रूप में देखना उचित नहीं होगा।

यह उस बड़े प्रश्न का हिस्सा है कि आधुनिक लोकतंत्र में dissent के लिए सार्वजनिक स्थान कितने खुले और कितने accessible रहने चाहिए।

यदि Jantar Mantar बंद किया जाता है, तो पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि जनता की आवाज़ के लिए उससे बेहतर, अधिक सुरक्षित, अधिक accessible और उतना ही प्रभावी लोकतांत्रिक मंच उपलब्ध हो।

क्योंकि लोकतंत्र केवल पाँच साल में एक बार मतदान करने का नाम नहीं है।

लोकतंत्र का अर्थ यह भी है कि चुनावों के बीच नागरिक अपनी सरकार से सवाल पूछ सके, अपनी शिकायत दर्ज करा सके और सार्वजनिक रूप से असहमति व्यक्त कर सके।

सरकार को केवल ballot box की आवाज़ नहीं सुननी चाहिए।

कभी-कभी सड़क पर उठी आवाज़ भी सुननी पड़ती है।

Jantar Mantar इसलिए महत्वपूर्ण है कि वह केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं रह गया है।

वह भारतीय लोकतंत्र की उस परंपरा का प्रतीक बन चुका है जिसमें एक सामान्य नागरिक सत्ता के सामने खड़ा होकर कह सकता है—

“मेरी बात भी सुनी जाए।”

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019

स्वप्न

हंसी मजाक के वातावरण में
जब गुजर जाते हैं
अनेक दिन
तो प्रतीत होने लगता है
वास्तविक ।

 हंसी मजाक में
तप कर
बाहर निकलने वाला सच
मानो सोना खरा।

हाँ  मुझे स्वीकार है
पसंद करता हूँ तुमको
और  कि तुमसे प्यार है।

 पर यह रहस्य 
अब तक रखा है
छुपा कर
अब तुम भी
राजदार हो।

 आह!
निंद्रा
तुम फिर विचलित हो गई
स्वप्न से जाग गया मैं,
मेरे स्वप्न टूटने की
तुम भी जिम्मेदार हो।

#शोएबवाणी

तुम्हारी व्यथा

तुम्हें मुस्कुराते देख
प्रफुल्लित हो उठता है मन
परन्तु यह खुशी हो जाती है काफूर
जब ध्यान से देखता हूँ
तुम्हारी तस्वीर को,
जिसमे मुस्कराहट के
पीछे छिपी पीड़ा
बना देती है प्रश्न चिन्ह
तुम्हारे माथे पर ।

तुम्हारे व्हटसअप स्टेटस
के आलोक में,
तुम्हारे चेहरे की मुस्कान
और उसके पीछे छिपे दर्द
की कल्पना करते हुए
खो जाता हुं
तार्किक गणनाओ में।

तुम्हारी यह मुस्कान
मुलम्मा है जिसे चढ़ा दिया
तुमने अपनी व्यथा पर
जिसे तुम छिपाना चाहते हो
समाज से
या शायद खुद से

पर मैं समझता हूँ
तुम्हारे अहसास को
कुछ खो जाने,
या ना पा सकने की कसक
मानो विफल हो गया हो
पहला प्यार ।

खूब पहचानता हूं मैं
यह तुम्हारी नहीं
सबकी व्यथा है
ऐसी स्थिति से जाने
कितनी बार लड़ा हूं
अभी जीवित हूँ
भला कहां मरा हूँ।

यह विडम्बना है कि
हर हंसते चेहरे के पीछे
एक त्रासद इतिहास है।

पर क्या यह मंजिल आखिरी है !
अरे इसके बाद भी जिंदगी है ।
हर सुबह नई उमंग है
हर रात स्वप्न नया है।

पर मंजिल उसे  मिली है
जो दुख पर विजयी हुआ।

प्रिये
कभी जो कर्तव्य पथ पर
बाधा पाओ
तो याद जरा मुझको करना
यह तुच्छ हर समय तैयार खड़ा है।

#तुम्हारी व्यथा
#शोएबवाणी

याद

याद
अकसर चलते-चलते
मैं खो जाता हूँ
कुछ पुराने निशानों में
जो बसे हैं अपनी यादों में
खुदा जाने यादें हैं सच्ची
या देखी थीं केवल ख़्वाबों में
कभी लगता है गुज़रा हूँ
इस ख़ामोश जंगल से
कभी लगता है आया हूँ
इन कब्रगाहों में
कभी लगता है हर अजनबी
जाना-पहचाना-सा
ये यादें हैं गुज़री
ज़िंदगानी की
या फिर ये वो ख़्वाब हैं ठहरे
जो ग़फ़लत दिखलाते थे रातों में
ना जाने कौन अक्सर
रातों को बुलाता है
इस दुनिया से दूर
कहकशाओं में
एक दुनिया नई-सी है
जहाँ बना है एक स्वप्न-महल
जहाँ से ये सदा आती है
जो मुझे बुलाती है
वहाँ कौन रहता है
जो हमको बुलाता है
वह कौन है!
और क्या उससे नाता है
शायद उससे प्यार हुआ था!
क्षितिज के उस पार
मिलने का इक़रार हुआ था
उसे पा जाने को
क्षितिज की तरफ़ चलता हूँ
फिर भी उतनी दूर खड़ा हूँ
जितना आगे बढ़ता हूँ
दूर क्षितिज पर शायद तू है
या क्षितिज है स्मृतियाँ तेरी
सूरज उदय हो या अस्त,
उसमें दिखती हैं विस्मृतियाँ तेरी
क्षितिज के इस पार खड़ा मैं
देख रहा हूँ नित नेम से
प्रिय, तुमको बड़े प्रेम से
हाँ, क्षितिज के इस पार खड़ा मैं
प्रतीक्षारत प्रेम लिए
आओ प्रियतम, छोड़ दो क्षितिज को
आ जाओ तुम इस पार
वरना ये बतला दो मुझको
कहाँ मिलेगा मेरा प्यार...

तीन ख़त

  किसी आदमी की ज़िंदगी में मोहब्बत कब दाख़िल होती है, इसका ठीक-ठीक पता शायद उसे भी नहीं चलता। बाद में जब वह पीछे मुड़कर देखता है तो उसे लगता...

tahlka