तुम को क्या बतलाएं बंधु
एक स्वपन था
जो टूट गया
एक आभासी घरोंदा था
जो फूट गया
हाय !
अपनी व्यथा
व्यर्थ यूं हि
समय गवांया
इन स्वपन को बुनने में
छणभर का ही
समय लगा
इस स्वपन महल को
गिरने में.
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किसी आदमी की ज़िंदगी में मोहब्बत कब दाख़िल होती है, इसका ठीक-ठीक पता शायद उसे भी नहीं चलता। बाद में जब वह पीछे मुड़कर देखता है तो उसे लगता...
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