सुनो !
मेरे पास ज़बान है
पर मेरे पास शब्द नहीं हैं
मौन में अभिव्यक्त करूँगा
अपनी बात
क्या प्रिये, तुम समझ पाओगी?
इस ख़ामोश अभिव्यक्ति को।
सुनो!
सुनो!
मैं व्यंजना में बात करता हूँ
मगर
तुम अभिधा में समझती हो
तुम्हारे और हमारे बीच
व्याकरण की यह दूरी
होने नहीं देती
प्रेम कविता को पूरी
लक्षणा में अगर कह दूँ
तो क्या तुम समझोगी?
मेरी इस पंक्ति को।
सुनो!
सुनो!
नहीं भाता हूँ मैं तुझे
शायद सूरत ही कुछ ऐसी हो
जो न किसी को सुहाती हो
मगर फिर भी
मैं कहता हूँ कि
सबको गढ़ा कुदरत ने
मैं भी उसकी
अनुपम प्रतिकृति हूँ
सौंदर्यबोध की
इस मृगतृष्णा को
अगर तुमने नहीं छोड़ा
तो फिर कैसे समझोगी
इस प्रतिकृति को?
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