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रविवार, 3 अप्रैल 2016

मानवता है अभिशप्त !

मानवता है अभिशप्त !
कवि तुम कहाँ हो?

मानवता है अभिशप्त !
कवि तुम कहाँ हो?
इंसान इंसान से टकरा रहा है
 चिराग ए मुहब्बत बुझा जा रहा है
 जो सच बोले वो सज़ा पा रहा है
 अब तेरा चुप रहना है पाप
 कवि तुम कह़ाँ हो?

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