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शुक्रवार, 28 अगस्त 2026

विरह पत्र

 

सच कहूँ तो मुझे उम्मीद नहीं थी कि तुम ऐसा करोगी।


अब तक मैंने पूरी वफ़ादारी से तुम्हें चाहा। कभी किसी और के बारे में सोचा तक नहीं। शायद इसी वजह से आज जो कुछ सामने आया है, उसे स्वीकार करना मेरे लिए इतना आसान नहीं है।


लेकिन एक बात अब समझ में आ गई है—एकतरफ़ा मोहब्बत, आख़िर एकतरफ़ा ही रहती है। कोई अपनी ज़िद, अपनी कोशिशों और अपने प्यार से तुम्हारी तरफ़ थोड़ा झुक भी जाए, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह हमेशा वहीं रहेगा। एक दिन उसे भी कोई ऐसा मोड़ मिल जाता है, जहाँ से वह लौटकर नहीं आता।


आज मुझे लगता है कि इस दुनिया में मोहब्बत जैसा शायद कुछ है ही नहीं… शायद यह भी एक खूबसूरत-सा भ्रम है, जिसे इंसान सच समझकर पूरी ज़िंदगी जीता रहता है।


तुमसे पहले मैंने जो नज़्में लिखी थीं, आज उनमें से हर एक फिर से प्रासंगिक लग रही है। मेरे ब्लॉग पर बहुत कुछ लिखा है—तुम्हारे नाम लिखे हुए दो ख़त भी हैं, जिन्हें मैंने कभी प्रकाशित नहीं किया।


काश… तुम उन्हें पढ़ पाती।


मगर अब शायद कभी नहीं।


अब तुम उन्हें कभी नहीं पढ़ पाओगी।


मेरी ज़िंदगी में अगर कोई असली सरमाया था, तो वह मोहब्बत थी। और आज ऐसा लग रहा है जैसे वह भी मेरे पास नहीं रही।


तुम्हारे अपनों ने मुझे बहुत पहले मना किया था। मैंने उनकी बात नहीं मानी। मेरा दिल आज भी पूरी तरह यह मानने को तैयार नहीं है कि जो कुछ मैंने देखा और जाना, वही सच है।


लेकिन सच से मुँह भी नहीं मोड़ा जा सकता।


न वह तस्वीर झूठी लगती है, न वह चैट।


ख़ैर… तुमने जो भी किया होगा, सोच-समझकर अपने भले के लिए ही किया होगा। मैं तुम्हें इसके लिए दोष नहीं दूँगा।


बस इतना है कि आठ साल कोई छोटा अरसा नहीं होता।


आठ सालों को छोड़ना आसान नहीं होता…

उन्हें भूलना तो और भी मुश्किल है।


लेकिन शायद ज़िंदगी का यही दस्तूर है—

कुछ लोग पूरी ज़िंदगी के लिए नहीं आते,

कुछ लोग हमें पूरी ज़िंदगी के लिए याद रहने के लिए मिलते हैं।


मैं नहीं जानता आगे क्या होगा।


बस इतना जानता हूँ कि ये दिन भी कट जाएँगे।


और शायद एक दिन मैं तुम्हें याद करके दुखी होने के बजाय सिर्फ़ इतना कह पाऊँगा—


“हाँ, कभी मैंने उसे बहुत मोहब्बत की थी।”

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